Sunday, November 10, 2013

मेरी थाती... 9

 मेरी थाती।



1. ये उनके दिए ज़ख्म हैं.. जाएंगे भी भला कैसे...
उन्हें कुरेदने में मज़ा आता है.. मुझे सहेजने में...     दिलीप कुमार पांडेय।


2. ज़िंदगी की कशमकश में..
क्या हुआ जो कुछ खो गया...
मेहरबानी अभी है उसकी मुझपर..
जो दिया वो भी अनमोल है...     दिलीप कुमार पांडेय।


3. हर ज़ख्म पर वो मुस्कुराते हैं ऐसे...
जिस्म पर एक नया 'तमगा' हो जैसे...
और क्या करूं उस 'ख़लील' का बयां...
इंसान के रूप में 'मसीह' हो जैसे...    दिलीप कुमार पांडेय।


4. सीने में हजार ज़ख्म हैं...
पर लबों पर मुस्कान है...
खुद सूखी रोटी खाते है...
औरों के लिए धनवान हैं...
यही तो जीने की कला है...
बाकी तो मौत के सामान है...    दिलीप कुमार पांडेय।


5. हर रोज तेरी निगाहों से क़त्ल होते हैं...
अब तो मरने की आदत सी हो गयी है...    दिलीप कुमार पांडेय।


6. टूटकर उसके बिखरने की अदा तो देखिये...
हर टुकड़े को सहेजने की कला तो देखिये...
कौन कहेगा वो कतरा-कतरा बिखरा है...
हर कतरे के साथ उसकी वफ़ा तो देखिये...    दिलीप कुमार पांडेय।


7. जीने - मरने का अहसास है.. तेरा होना, ना होना...
कैसी विडंबना है.. ज़ख्म तू है तो मरहम भी तुम ही हो...   दिलीप कुमार पांडेय।


8. खिला हुआ 'चांद' कितना सकून देता है...
पर अफसोस कि हर दिन ये रूप बदल लेता है...    दिलीप कुमार पांडेय।


9. पेड़ से टूटे शाख कब बेकार होते हैं...
आसमान से गिरी बूंदें कब जाया होती हैं...
वक्त की पहरेदरी में भी कबतक बंधा है कोई...
ये धरती, फिज़ां, ये आसमां, अपने ही तो हैं...
फिर किसी से ज़ुदा होने पर दर्द क्यों...
ज़िंदगी में कुछ खोने या नहीं होने पर अफसोस क्यों...
ये माना कि आज घना अंधियारा है...
लेकिन ये भी हकीकत है, कल फिर एक नया सवेरा है...   दिलीप कुमार पांडेय।


10. तुम अपने जाने की वजह जो बता देते...
यकीं मानो, मंज़िल तक छोड़ने हम भी आते...
अब तो ना तू है, ना ही तेरा पता...
क्या होता, जो जाते-जाते अलविदा कह जाते...    दिलीप कुमार पांडेय।

मेरी थाती... 8

मेरी थाती।



11. उसने जो दिया, जो ना दिया.. दोनों बेशकिमती हैं...
आखिर खजाना उनका है...
हम तो फकीर ठहरे...
पाने पर मुस्कुराना क्या, खोने पर रोना क्या...    दिलीप कुमार पांडेय।


12. हमने जिसे सोना समझा था, वो पारस निकला...
बुत जानकर बेअदबी की, वो ख़ुदा निकला।
कैसे कहूं कि, ख़ता हो गयी मुझसे...
आदमी जिसे समझा, परवरदिगार निकला ।।    दिलीप कुमार पांडेय।


13. दिल ही दिल में मुस्कुराते हैं...
तेरी यादों का गुलशन सजाते हैं...
रोम-रोम खिल उठता है मेरा...
जब भी खयालों में तुझे पाते हैं...   दिलीप कुमार पांडेय।


14. ना दिन का होश है, ना रात का ठिकाना।
इक तेरा ख्याल ही है, जो वजूद का पता देता है ।।     दिलीप कुमार पांडेय।


15. तेरी ख़ामोशी को क्या समझूं मैं...
एकबार बेरुखी का सबब तो बताते...
मैंने तो बस चांद को पाने की ख्वाहिश थी...
ग़र गुनहगार हूं, तो फ़ैसला क्यों नहीं सुना देते...    दिलीप कुमार पांडेय।


16. आज सुबह कितनी खिली-खिली है...
रात को सपने में मां को देखा था...   दिलीप कुमार पांडेय।


17. वो खून नहीं, पानी था.. जो खेतों में बह गया...
कसूरवार थे वो, जो क़त्ल-ए-आम हो गये...    दिलीप कुमार पांडेय।


18. हर बात पर मुस्कुराते हो ऐसे...
सर्द रात मे 'बर्फबारी' हो जैसे...
तेरे जमे चेहरे से 'पिघलती हंसी'...
किसी कयामत का इशारा हो जैसे...    दिलीप कुमार पांडेय।


18. ये ज़िंदगी का मेला है..
हर चेहरा एक किताब है...
हाथ में लेकर पन्ने पलटिये..
हर पेज एक नयी दास्तां है...    दिलीप कुमार पांडेय।


19. मज़लूमों पर ज़ुल्म की बात क्यों..
'क़ातिल' हो, सब जानते हैं...
'ख़तवार' तो और भी हैं यहां..
'क़ातिब' से क़ैदखाने की बात क्यों...    दिलीप कुमार पांडेय।


20. ज़माना कब दुश्मन रहा है किसी का...
पिछड़ने वाले ही अक्सर वार करते हैं...   दिलीप कुमार पांडेय।

मेरी थाती... 7

मेरी थाती।



21. ज़िंदगी की शाम कुछ ऐसे रोशन होगी..
मुमकिन ना था...
पर आप जो आए..
जैसे सुबह ने फिर दस्तक दी हो...    दिलीप कुमार पांडेय।


22. साहिल पर खड़े होकर किसे ढुंढता है तू...
ये दरिया.. इश्क का है...
डूबने वाले को हीं ये 'जन्नत' नसीब होती है...    दिलीप कुमार पांडेय।


23. मत देख ऐसे, कि नज़र झुक जाए...
आईना है तू मेरा..
मिली जो नज़र..
कहीं राज ना खुल जाए...    दिलीप कुमार पांडेय।


24. हर वक़्त सरफ़रोशी की बात करते हो...
क्यों मां को रुलाने की बात कहते हो...
मुजरिम.. ज़माना है, मालूम है मुझे...
पर सज़ा की बात, मुझसे ही करते हो...    दिलीप कुमार पांडेय।


25. क़त्ल कर, सीना तान कर चल...
यूं ही, सरताज नहीं बना करते... ।
सर-अंजाम की फिक्र उसे कहां...
जान लेते, तो कफ़न भी ले आते.... दिलीप कुमार पांडेय।




26. दिलों के मिलने की बात ना कीजिए...
ज़माना लेनदेन का है...
बाज़ार-ए-इश्क में खरीदार तो हैं...
क़द्रदानों की बात ना कीजिए...   दिलीप कुमार पांडेय।


27. सुलह की हर कोशिश बेकार गयी...
उसके शहर में पनाह ना मिला...
बात जान देने की भी आयी...
पर ना ख़ंजर, ना ही क़त्लगाह मिला...   दिलीप कुमार पांडेय।


28. ना मयखाना देखा, ना पैमाने का शौक...
फिर जाने ये बेखबरी क्यों...
होश आया तो मालूम हुआ....
उसकी आंखों में मैंने शराब देखी थी...    दिलीप कुमार पांडेय।


29. जाने किस दिशा जाएंगे हम...
आज 'हवा' का मिजाज बदला-बदला सा है...    दिलीप कुमार पांडेय।


30. हम दिलों जान से चाहते हैं...
बर्षों तक उन्हें पता ना चला।
ज़ुबां के चंद अल्फ़ाज क्या निकले...
कदमों में वो जहां लुटा बैठे....     दिलीप कुमार पांडेय।

मेरी थाती... 6

मेरी थाती।


31. हवाओं को भी शहरों से डर लगता है...
कहती हैं, तंग गलियों में दम घुटता है....  दिलीप कुमार पांडेय।


32. जेब खाली हो, तो इंसान के 'वजन' का पता चलता है....
ग़र सब्र हो, तो मुफ़लिसी भी मजा देता है...     दिलीप कुमार पांडेय।


33. तेरी नज़र क्या पड़ी मुझपर,
मेरी 'मिट्टी' भी सोना बन गयी...
ये कैसा.. 'करम' है तेरा,
बिन मांगे 'अनमोल' कर गई...     दिलीप कुमार पांडेय।


34. हम हैं तो सुबह है.. हम हैं तो शाम है...
ये ज़माना भी हमीं से है.. हम हैं तो जहान है....
बस यही है ज़िंदगी, हम जो नहीं.. सब वीरान है....    दिलीप कुमार पांडेय।


35. अधूरे ख्वाबों की ही मेहरबानी है...
ज़िंदगी जिये जा रहा हूं मैं...
ख़त्म ना हो, ख्वाबों का ये सिलसिला...
जो पूरे हुए, फिर कहां जिंदगानी है....    दिलीप कुमार पांडेय।


36. वो 'मिट्टी' की मूरत है, या 'परी' कोई...
'करिश्मा', कुदरत का है या हकीकत कोई...
ख्वाहिश है, सज़दे में 'खप' जाये हम...
जो ग़र मिल जाये वो, खुदा बन जाये हम...   दिलीप कुमार पांडेय।


37. ये उनकी अदा है, या हुस्न का गुरूर...
मुझ फ़कीर से भी बेअदबी कर बैठे...
हाथ तो मैंने पहले ही फैलाया था...
नज़र मिलाई.. और फेरकर चल दिये...    दिलीप कुमार पांडेय।


38. ख्वाबों में देखा है, दुआओं से संवारा है..
पलकों के रास्ते से, दिल में बसाया है...
मेरी मन्नत भी है वो, मेरा जन्नत भी है...
आरजू है खुदा से, सलामत रहे वो...
मेरा सपना ही सही, पर अपना भी है...   दिलीप कुमार पांडेय।


39. वो कायर है.. शातिर है, पीछे से ही वार करेगा...
पर तुम क्यों 'हरम'' में मर्दानगी हराम करते हो...
थू है इस देश के हुक्मरानों तुमपर..
जिस मिट्टी का खाते हो,उसी का बाज़ार लगाये बैठे हो...   दिलीप कुमार पांडेय।


40. लोग कहते हैं मुझे, होश में आ जाओ...
पर होश वालों को भी गिरते देखा है...
मेरी बे-होशी की तबियत कुछ ऐसी है...
होश में आकर गिरना कौन चाहता है...    दिलीप कुमार पांडेय।

मेरी थाती.... 5

मेरी थाती....



41. एक वो चांद है, एक चांद मेरे पास भी है...
खूबसूरत वो भी है, खूबसूरत मेरा चांद भी...
एक जहां को रोशन करता है, उसकी रोशनी मेरे अंदर है...
क्यूं देखूं मैं उस चांद को, जब पास में मेरा चांद है...    दिलीप कुमार पांडेय।


42. भिखारी और ग़रीबी का फ़र्क...
किसी ग़रीब की औकात देनेवाला तय करता है...
जबकि भिखारी से देनेवाले की औकात का पता चलता है...    दिलीप कुमार पांडेय।


43. तुम ना थे ज़िंदगी में मेरे,
तब भी मैं ज़िंदा था...
तुम हो ज़िंदगी में मेरे,
तब भी मैं ज़िंदा हूं....
फ़र्क बस इतना है...
तब ज़िंदगी, मुझे जीती थी,
आज, मैं ज़िंदगी को जीता हूं....   दिलीप कुमार पांडेय।


44. चंद लम्हे जो पास में वो बैठे...
बहारों से भर गया दामन मेरा;
कल तक अजनबी थे हम...
अब जनम-जनम का साथ लगता है....   दिलीप कुमार पांडेय।


45. हमसफ़र संगदिल हो, तो हर सफ़र आसान होता है...
कदम चूमती है राहें, मंज़िल भी पता देता है...     दिलीप कुमार पांडेय।


46. तुम ख़ुद को ख़दा ना समझो...
इंसान हूं मैं...
जाने कब इरादा बदल जाये...   दिलीप कुमार पांडेय।


47. रोशन करने में चिराग़ कहां फ़र्क करते हैं...
होश तो हम इंसानों ने खोया है...     दिलीप कुमार पांडेय।


48. ये तेरी हुकूमत है कि सलामत है हस्ती मेरी...
वरना इस 'शहर' में कत्ल होना आम बात है...    दिलीप कुमार पांडेय।


49. "दोस्ती-यारी" के अब मायने बदल गये हैं...
मतलब निकला तो ठीक, नहीं तो "क़ायदे" बदल गये हैं...   दिलीप कुमार पांडेय।


50. एक हो रहे हैं धरती - आसमां
ये वक्त है कुछ ठहरने का
दिन और रात के मिलन का
कैसी लालिमा फैली है चहुं ओर
दुल्हन की तरह रात आ रही है
आओ एक हो जाएं हम भी
इस सुरमई शाम में खो जाएं हम भी.....    दिलीप कुमार पांडेय।

मेरी थाती … 4

मेरी थाती ……




51. बड़ा गुरूर था अपने वतनपरस्ती पर...
एक दिन तिलक क्या लगाया, कई आंखें लाल हो गयीं...
सोंचा कि अब टोपी भी पहनी जाये...
लोगों ने बहुरुपिये का तोहमत लगा दिया....    दिलीप कुमार पांडेय।


52. नक्शे कदम कुछ इस तरह बनाये मैने..
हर शख्स खींचा चला आता है...
ख़ुदा की ये ख़ास नेमत है मुझपर...
तंग गलियों में भी घर रोशन है...    दिलीप कुमार पांडेय।


53. उसने तो हर कदम पर 'शह' और 'मात' देने में कमी नहीं की...
ये ख़ुद पर यकीन ही था.. रास्ते का कांटा भी हमसफ़र बन गया...     दिलीप कुमार पांडेय।


54. तुम साथ थे तो सदियां पलों में सिमटी थीं....
तुम दूर जो गये, हर पल सदी बन गयी है...   दिलीप कुमार पांडेय।


55. मिन्नत की, आरजू की, बहुत गुजारिश भी की...
ऐ ज़िंदगी, इतनी मोहलत ना दे...
ख्वामखा.. मौत को भी दुश्मन बना दिया...     दिलीप कुमार पांडेय।


56. दर्द जब हद से गुजरता है
होठों पर मुस्कान तैर जाती है
एक मीठा अहसास दिल को छू जाता है
अब खुद से इसे दूर करूं भी तो कैसे
यही तो है, जिसे सिर्फ़ देना आता है....   दिलीप कुमार पांडेय।


57. वक्त ने हौसले पर पहरा लगाया है...
इम्तहान मेरा है तो, कठघरे में वक्त भी है...
देखें टूटता हौसला है, या फिर बदलता.. वक्त है....   दिलीप कुमार पांडेय।


58. सवाल उनका था
ज़माने से मुंह खोला ना गया...
सवाल मेरा भी आया
शोर उठा और 'आह' निकल गयी...    दिलीप कुमार पांडेय।


59. सितारों को छूने की ख्वाहिश क्या की...
नींद, चैन सबने साथ छोड़ दिया ।
अभी ख्याल आया है, तो ये हाल है...
मंज़िल आते-आते कहीं जहान ना साथ छोड़ दे...  दिलीप कुमार पांडेय।


60. मज़लिस-ए-ग़म की रवायत है...
हर ग़म में खुशी छलकनी चाहिए ।
वो दूर है हमसे तो क्या हुआ...
यादों में नूर बरसना चाहिए...    दिलीप कुमार पांडेय।

मेरी थाती … 3

मेरी थाती …।




61. एक वादा था उनका, जो फिर टूट गया,
एक दिलासा था उनका, जो बिखर गया
मैंने उम्मीद तो नहीं की थी,
भरोसा उनका था, खुद ही तोड़ दिया...   दिलीप कुमार पांडेय।


62. ज़िंदगी ठहरी सी ज़रूर है ,
लेकिन रुकना नहीं आता ।
है डगर कठिन मगर,
मुझे टूटना नहीं आता ।
हौसला हमसफ़र है मेरा,
पीछे मुड़कर देखना नहीं आता....   दिलीप कुमार पांडेय।


63. लोग मुझे नक़ाबपोश कहते हैं.,
यहां तो चेहरों के पीछे कई चेहरे नज़र आते हैं...   दिलीप कुमार पांडेय।


64. एक सपना था..
जो कभी अपना था...
वक्त बदला.. साल बदले...
महिना बदला.. दिन बदले...
अपना, वो आज भी है...
लेकिन.. सपनों में...    दिलीप कुमार पांडेय।


65. ये किसकी अट्टाहास है, लगता है फिर कोई उदास है...
कैसी विडंबना है ये..
हर चेहरे के पिछे, इक चेहरा नज़र आता है...
कही मुस्कुराता, तो कही स्याह नज़र आता है...
पूछते हैं अक्सर आईने से, दमकते चेहरे...
क्या बात है, जो तुझे नज़र नहीं आता है...    दिलीप कुमार पांडेय।


66. झूठ के सामने सच कितना बेबस है...
तमाम खूबियां हैं.. फिर भी हम नतमस्तक है...
वक्त का फरेब है.. या कमजोरी मेरी...
आखिर कब तक सहेंगे झूठ की सीनाजोरी...
चाहता तो हूं.. वो सामने से हो मुक़ाबिल...
लेकिन वो झूठ है.. इस बात का इल्म उसे भी है...    दिलीप कुमार पांडेय।


67. उसने कहा, भगवान हूँ...
मैने कहा, इंसान हूँ...

उसने कहा, रकीब हूँ...
मैने कहा, कनीज़ हूँ...

उसने कहा, नसीब हूँ...
मैने कहा, फकीर हूँ...

उसने कहा, खुद्दारी है...
मैने कहा, अहंकार है...

उसने कहा, मिट जाओगे...
मैने कहा, बिछ जाऊंगा...

उसने कहा, लाचारी है...
मैने कहा, बिमारी है...

उसने पूछा, तुम कौन हो...
मैने कहा, तुम्हारा दोस्त...!   दिलीप कुमार पांडेय।



68. आज चांद को मुस्कुराते देखा...
लगा जैसे.. सूरज काली घटाओं से निकलने की जद्दोजहद में हो...?

आज चांद को मुस्कुराते देखा...
जैसे तेज आंधी में दिया टिमटिमा रहा हो...?

आज चांद को मुस्कुराते देखा...
लगा जैसे.. बंद कली से भौंरा रस निकाल रहा हो...?

काश ! चांद कभी यूं भी मुस्कुराये..
जैसे बादलों को चीरकर सूरज निकलता है... ।

काश ! चांद कभी ऐसे मुस्कुराये...
जैसे अंधेरे को दीपक रोशन करता है...।

काश ! चांद कभी ऐसे भी मुस्कुराये...
जैसे फूलों के पास भौंरा मंडराता है...।      दिलीप कुमार पांडेय।



69. ज़िंदगी तेरी सूरत भी अजीब है...
चाहत थी मुरीद बनूं तेरा...
लेकिन वक्त ने कनीज़ बना दिया...

ज़िंदगी तेरी सीरत भी अजीब है..
सोंचा तो था दिल में बसूं तेरे...
लेकिन हालात ने दर-बदर कर दिया...

कैसी ये फितरत है ज़िदगी तेरी...
वो सबकुछ दिया.. जो मांगा न गया...
लेकिन क्या हिसाब उसका, जो तूने मांगने पर भी ना दिया...      दिलीप कुमार पांडेय।


70. जब उनकी आशनाई नहीं थी.. मेरे पास तनहाई भी नहीं थी...
अब दिल उनका दिवाना है.. और मैं तनहाई का...      दिलीप कुमार पांडेय।

मेरी थाती ... 2


मेरी थाती।।।



71. इक आह जो दिल से निकली.. महफिल वाह-वाह से गूंज उठी...
हमनें तो ग़म का राग छेड़ा था.. लोगों ने सर आँखों बैठा लिया...    दिलीप कुमार पांडेय।


72. मेरे पास तो आज कोई ग़म नहीं है...
लेकिन ये क्या कम है कि, यार मेरा उदास है...   दिलीप कुमार पांडेय।


73. खंज़र जब पीछे लगा, तो एहसास हुआ...
शायद किसी दोस्त नें नज़र फेर ली है....
हमने तो उनकी ख़ातिर ही सर झुकाया था...
क्या मालूम.. उन्हें मौके की तलाश है....    दिलीप कुमार पांडेय।


74. कैसे बाज़ारू हो गये हैं हम...
अदना सा ख़रीदार भी.. क़ीमत लगा जाता है...
बहुत कोशिश की... क़ायम रहे वजूद...
पर क्या हो.. जब साथी भी कतार में नज़र आता है...    दिलीप कुमार पांडेय।


75. 'मिट्टी के बुतों की अकड़ तो देखिये...
खुद अपनी 'मिट्टी को भूल गये है...
कोई जरा बताये इनको...
टूटने के बाद मिलना भी इसी 'मिट्टी में है...    दिलीप कुमार पांडेय।


76. सवाल पर सवाल का बोझ बढ़ता ही जा रहा है...
जवाब भी है.... पर इतना सीमित कि, दबता ही जा रहा है...    दिलीप कुमार पांडेय।


77. सुना था.. दिल मांगी हुई हर दुआ कबूल होती है...
कैसे नादां थे हम....
हमने तो आशनाई में कलेजा चीर कर पेश कर दिया...
उनसे चेहरे का नक़ाब भी ना हटाया गया...      दिलीप कुमार पांडेय।


78. तारीफ़ के चंद अल्फ़ाज़ों से ही...
खुदा समझने लगे वो खुद को...
उन्हें ये इल्म नहीं शायद...
बुतों में जान कहां होती है....   दिलीप कुमार पांडेय।


79. ग़ैरों में कहां दम, जो मेरी हस्ती मिटा सकें...
वो तो हमीं हैं, कि खुद अपनी कब्र खोदे बैठे है...    दिलीप कुमार पांडेय।


80. वो कौन है, आखिर वास्ता क्या है उनसे मेरा...
सुबह-शाम यही सवाल जेहन में कौंधता है...
एक चेहरा है, खुबसूरत है.. बस इतना पता है मुझे...
चाहता तो हूं, चेहरे के पीछे के चेहरे को पढ़ना...
लेकिन, डर है.. नकाब उसका उतरेगा, तो बेनकाब.. मैं भी कहां रहूंगा।    दिलीप कुमार पांडेय।

मेरी थाती।।।

मेरी थाती।।।






81. इरादों ने बनाया बनाया था
हाथों से सजाया था
इस अजनबी शहर में
एक आशियाना बनाया था...
बहुत मिला, बहुत किया
वक्त यूं ही उड़ता रहा
खुशियां मिलीं, ज़िंदगी संवरी
अनजाने भी... जान बने...
अचानक तारीख़ बदली है
सब बिखरा-बिखरा सा है
नया आशियाना सजाने
अब रुख़सत की बेला है...  अलविदा हैदराबाद।     दिलीप कुमार पांडेय।


82. ज़िंदगी हर रोज एक नयी कहानी है...
सहेजो, तो किताब बन जाये....
नहीं, तो जमाने की आंधी के आगे,
पन्ने की क्या बिसात....    दिलीप कुमार पांडेय।


83. यूं तो राह-ए-ज़िंदगी आसां नही होती...
चलते सब हैं, मगर मंज़िल नहीं मिलती...
अज़ब फलसफ़ा है ये ज़िंदगी का...
किसी को पूरी, तो किसी को आधी भी नहीं मिलती...    दिलीप कुमार पांडेय।


84. हर दिन ख़ास होता है... हर बात ख़ास होती है...
ज़िंदगी तेरी सुबह और शाम ख़ास होती है...
जाने मैं किस उधेड़बुन में हूं...
रास्ता भी है, मंज़िल भी...
फिर क्या बात है... जो निराश करती है...    दिलीप कुमार पांडेय।


85. सामने समंदर, और अंदर प्यास भी है...
हर गुज़रता लम्हा, कुछ उदास... और कुछ ख़ास भी है...
किसे पसंद नहीं... आसमां की बलंदियां हासिल करना...
इक हम हैं... कि जमीं छोड़... कदम उठते ही नहीं...     दिलीप कुमार पांडेय।


86. अंदर इक कश्मकश सी है...
वक्त ने दोराहे पर ला पटका है...
ऐ ख़ुदा इक नज़र इधर भी कर...
बिखरने से पहले, समेट लूं आशियाने को...    दिलीप कुमार पांडेय। (09/-1/2013).


Saturday, November 9, 2013

जिस रास्ते तुम हमारे घर आये...
हर गली, गुलशन बन गयी...
आंगन था घर का सूना-सूना...
तेरे आने से हर शै खिल गयी...


दिलीप कुमार पांडेय।