मेरी थाती।
31. हवाओं को भी शहरों से डर लगता है...
कहती हैं, तंग गलियों में दम घुटता है.... दिलीप कुमार पांडेय।
32. जेब खाली हो, तो इंसान के 'वजन' का पता चलता है....
ग़र सब्र हो, तो मुफ़लिसी भी मजा देता है... दिलीप कुमार पांडेय।
33. तेरी नज़र क्या पड़ी मुझपर,
मेरी 'मिट्टी' भी सोना बन गयी...
ये कैसा.. 'करम' है तेरा,
बिन मांगे 'अनमोल' कर गई... दिलीप कुमार पांडेय।
34. हम हैं तो सुबह है.. हम हैं तो शाम है...
ये ज़माना भी हमीं से है.. हम हैं तो जहान है....
बस यही है ज़िंदगी, हम जो नहीं.. सब वीरान है.... दिलीप कुमार पांडेय।
35. अधूरे ख्वाबों की ही मेहरबानी है...
ज़िंदगी जिये जा रहा हूं मैं...
ख़त्म ना हो, ख्वाबों का ये सिलसिला...
जो पूरे हुए, फिर कहां जिंदगानी है.... दिलीप कुमार पांडेय।
36. वो 'मिट्टी' की मूरत है, या 'परी' कोई...
'करिश्मा', कुदरत का है या हकीकत कोई...
ख्वाहिश है, सज़दे में 'खप' जाये हम...
जो ग़र मिल जाये वो, खुदा बन जाये हम... दिलीप कुमार पांडेय।
37. ये उनकी अदा है, या हुस्न का गुरूर...
मुझ फ़कीर से भी बेअदबी कर बैठे...
हाथ तो मैंने पहले ही फैलाया था...
नज़र मिलाई.. और फेरकर चल दिये... दिलीप कुमार पांडेय।
38. ख्वाबों में देखा है, दुआओं से संवारा है..
पलकों के रास्ते से, दिल में बसाया है...
मेरी मन्नत भी है वो, मेरा जन्नत भी है...
आरजू है खुदा से, सलामत रहे वो...
मेरा सपना ही सही, पर अपना भी है... दिलीप कुमार पांडेय।
39. वो कायर है.. शातिर है, पीछे से ही वार करेगा...
पर तुम क्यों 'हरम'' में मर्दानगी हराम करते हो...
थू है इस देश के हुक्मरानों तुमपर..
जिस मिट्टी का खाते हो,उसी का बाज़ार लगाये बैठे हो... दिलीप कुमार पांडेय।
40. लोग कहते हैं मुझे, होश में आ जाओ...
पर होश वालों को भी गिरते देखा है...
मेरी बे-होशी की तबियत कुछ ऐसी है...
होश में आकर गिरना कौन चाहता है... दिलीप कुमार पांडेय।