मेरी थाती।
11. उसने जो दिया, जो ना दिया.. दोनों बेशकिमती हैं...
आखिर खजाना उनका है...
हम तो फकीर ठहरे...
पाने पर मुस्कुराना क्या, खोने पर रोना क्या... दिलीप कुमार पांडेय।
12. हमने जिसे सोना समझा था, वो पारस निकला...
बुत जानकर बेअदबी की, वो ख़ुदा निकला।
कैसे कहूं कि, ख़ता हो गयी मुझसे...
आदमी जिसे समझा, परवरदिगार निकला ।। दिलीप कुमार पांडेय।
13. दिल ही दिल में मुस्कुराते हैं...
तेरी यादों का गुलशन सजाते हैं...
रोम-रोम खिल उठता है मेरा...
जब भी खयालों में तुझे पाते हैं... दिलीप कुमार पांडेय।
14. ना दिन का होश है, ना रात का ठिकाना।
इक तेरा ख्याल ही है, जो वजूद का पता देता है ।। दिलीप कुमार पांडेय।
15. तेरी ख़ामोशी को क्या समझूं मैं...
एकबार बेरुखी का सबब तो बताते...
मैंने तो बस चांद को पाने की ख्वाहिश थी...
ग़र गुनहगार हूं, तो फ़ैसला क्यों नहीं सुना देते... दिलीप कुमार पांडेय।
16. आज सुबह कितनी खिली-खिली है...
रात को सपने में मां को देखा था... दिलीप कुमार पांडेय।
17. वो खून नहीं, पानी था.. जो खेतों में बह गया...
कसूरवार थे वो, जो क़त्ल-ए-आम हो गये... दिलीप कुमार पांडेय।
18. हर बात पर मुस्कुराते हो ऐसे...
सर्द रात मे 'बर्फबारी' हो जैसे...
तेरे जमे चेहरे से 'पिघलती हंसी'...
किसी कयामत का इशारा हो जैसे... दिलीप कुमार पांडेय।
18. ये ज़िंदगी का मेला है..
हर चेहरा एक किताब है...
हाथ में लेकर पन्ने पलटिये..
हर पेज एक नयी दास्तां है... दिलीप कुमार पांडेय।
19. मज़लूमों पर ज़ुल्म की बात क्यों..
'क़ातिल' हो, सब जानते हैं...
'ख़तवार' तो और भी हैं यहां..
'क़ातिब' से क़ैदखाने की बात क्यों... दिलीप कुमार पांडेय।
20. ज़माना कब दुश्मन रहा है किसी का...
पिछड़ने वाले ही अक्सर वार करते हैं... दिलीप कुमार पांडेय।
11. उसने जो दिया, जो ना दिया.. दोनों बेशकिमती हैं...
आखिर खजाना उनका है...
हम तो फकीर ठहरे...
पाने पर मुस्कुराना क्या, खोने पर रोना क्या... दिलीप कुमार पांडेय।
12. हमने जिसे सोना समझा था, वो पारस निकला...
बुत जानकर बेअदबी की, वो ख़ुदा निकला।
कैसे कहूं कि, ख़ता हो गयी मुझसे...
आदमी जिसे समझा, परवरदिगार निकला ।। दिलीप कुमार पांडेय।
13. दिल ही दिल में मुस्कुराते हैं...
तेरी यादों का गुलशन सजाते हैं...
रोम-रोम खिल उठता है मेरा...
जब भी खयालों में तुझे पाते हैं... दिलीप कुमार पांडेय।
14. ना दिन का होश है, ना रात का ठिकाना।
इक तेरा ख्याल ही है, जो वजूद का पता देता है ।। दिलीप कुमार पांडेय।
15. तेरी ख़ामोशी को क्या समझूं मैं...
एकबार बेरुखी का सबब तो बताते...
मैंने तो बस चांद को पाने की ख्वाहिश थी...
ग़र गुनहगार हूं, तो फ़ैसला क्यों नहीं सुना देते... दिलीप कुमार पांडेय।
16. आज सुबह कितनी खिली-खिली है...
रात को सपने में मां को देखा था... दिलीप कुमार पांडेय।
17. वो खून नहीं, पानी था.. जो खेतों में बह गया...
कसूरवार थे वो, जो क़त्ल-ए-आम हो गये... दिलीप कुमार पांडेय।
18. हर बात पर मुस्कुराते हो ऐसे...
सर्द रात मे 'बर्फबारी' हो जैसे...
तेरे जमे चेहरे से 'पिघलती हंसी'...
किसी कयामत का इशारा हो जैसे... दिलीप कुमार पांडेय।
18. ये ज़िंदगी का मेला है..
हर चेहरा एक किताब है...
हाथ में लेकर पन्ने पलटिये..
हर पेज एक नयी दास्तां है... दिलीप कुमार पांडेय।
19. मज़लूमों पर ज़ुल्म की बात क्यों..
'क़ातिल' हो, सब जानते हैं...
'ख़तवार' तो और भी हैं यहां..
'क़ातिब' से क़ैदखाने की बात क्यों... दिलीप कुमार पांडेय।
20. ज़माना कब दुश्मन रहा है किसी का...
पिछड़ने वाले ही अक्सर वार करते हैं... दिलीप कुमार पांडेय।
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