Saturday, June 12, 2010

जरूरी तो नहीं...........

दोस्तों, मैंने अपनी ब्लॉग पर एक नयी ग़ज़ल पोस्ट की है। आप उस ग़ज़ल को aakarshangiri.blogspot.com पर पढ़सकते हैं। मैं इस ब्लॉग पर एक और ग़ज़ल पोस्ट कर रहा हूँ. इस ग़ज़ल को खामोश देहलवी साहब ने लिखा है. निश्चित ही येग़ज़ल आपको बहुत पसंद आएगी. तो पेश है खामोश देहलवी की लिखी ये ग़ज़ल-

उम्र जलवों में बसर हो ये जरूरी तो नहीं
हर शब-
-ग़म की सहर हो ये जरूरी तो नहीं

चश्म-
- साकी से पियो, या लब--सागर से
पियो
बेखुदी आठों पहर हो ये जरूरी तो नहीं

नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी सकती है।
उसकी आग़ोश में सर हो ये जरूरी तो नहीं

शेख करता तो है मस्जिद में खुदा के
सजदे
उसके सजदे में असर हो ये जरूरी तो नहीं है।

सबकी नज़रों में हो साकी ये जरूरी है मगर
सबपे साकी की नज़र हो ये जरूरी तो नहीं है।
-
खामोश देहलवी