Monday, July 26, 2010

गुण नहीं हो तो जीवन व्यर्थ है
विन्रमता नहीं हो तो डिग्री व्यर्थ है
भूख नहीं हो तो भोजन व्यर्थ है
जोश नहीं हो तो हथियार व्यर्थ है
पुण्य नहीं करने वाले का जिंदगी व्यर्थ है

Friday, July 16, 2010

कौन है वो परछाई

दोस्तों, आज मैं एक कविता पेश कर रहा हूँ। ये कविता मेरे पिताजी ने लिखी है और ये उनकी और हम सबकी पसंदीदा कविता हैतो आप भी इस कविता को पढ़ें - aakarshan

आज
तक पड़ी नहीं दिखाई
कौन है वो परछाई

किसने मेरी लेखनी चलाई
तर्जनी में शक्ति बन समाई
कौन बन गया है कागज़
कौन बन गयी है रोशनाई

दूर ही से शब्द आ रहे हैं
कान नहीं प्राण सुन रहे हैं
शब्द हैं या शब्द हैं नहीं ये
किसने कैसी बांसुरी बजायी

वेदना की आग जल रही है
वेदना में देह गल रही है
वेदना भुगत रही है वेदना
वेदना ने वेदना जगाई

रूप नहीं देखूं परछाईं
तो सोचता हूँ आयी है-न आयी
एक बार पास आ सके तो
सौंप दूंगा दर्द की मिठाई

Friday, July 9, 2010

मीना कुमारी की ग़ज़ल

दोस्तों, मैं आज जो ग़ज़ल पोस्ट करने जा रहा हूँ इसे गाया मीना कुमारी ने हैमैं इस ग़ज़ल को पोस्ट कर रहा हूँ. अगर मौका लगे तो आप इसे एक बार सुनें जरूर यही गुज़ारिश करूंगा
यूँ तेरी रहगुज़र से, दीवानावार गुजरे
काँधे पे अपने रखकर अपना मज़ार गुजरे

बैठे हैं रास्ते में दिल का खंडहर सजाकर
शायद इसी तरफ से, एक दिन बहार गुजरे

बहती हुई ये नदिया, घुलते हुए किनारे
कोई तो पार उतारे, कोई तो पार गुजरे

तुने भी हमको देखा, हमने भी तुमको देखा
तुम दिल ही हार बैठे, हम जान हार गुजरे

Saturday, June 12, 2010

जरूरी तो नहीं...........

दोस्तों, मैंने अपनी ब्लॉग पर एक नयी ग़ज़ल पोस्ट की है। आप उस ग़ज़ल को aakarshangiri.blogspot.com पर पढ़सकते हैं। मैं इस ब्लॉग पर एक और ग़ज़ल पोस्ट कर रहा हूँ. इस ग़ज़ल को खामोश देहलवी साहब ने लिखा है. निश्चित ही येग़ज़ल आपको बहुत पसंद आएगी. तो पेश है खामोश देहलवी की लिखी ये ग़ज़ल-

उम्र जलवों में बसर हो ये जरूरी तो नहीं
हर शब-
-ग़म की सहर हो ये जरूरी तो नहीं

चश्म-
- साकी से पियो, या लब--सागर से
पियो
बेखुदी आठों पहर हो ये जरूरी तो नहीं

नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी सकती है।
उसकी आग़ोश में सर हो ये जरूरी तो नहीं

शेख करता तो है मस्जिद में खुदा के
सजदे
उसके सजदे में असर हो ये जरूरी तो नहीं है।

सबकी नज़रों में हो साकी ये जरूरी है मगर
सबपे साकी की नज़र हो ये जरूरी तो नहीं है।
-
खामोश देहलवी

Wednesday, May 26, 2010

निमंत्रण

आज जबकि मिट गयी हैं दूरियां
रह नहीं पाया है कोई फासला
शब्द जो कि बोझ थे ताजिंदगी
अब ये जाना शब्द ही थे घोंसला...

दोस्तों, शब्दों की इस दुनिया में ये मेरी पहली पोस्ट है। ज़रा सोचिये, अगर शब्द नहीं होते तो दुनिया कैसी होती। न जाने कितनी बेरंग होती। सिर्फ चेहरे पर ही कुछ भावों को दिखाकर हम कितना कुछ कर पाते। शब्दों की दुनिया न होती तो आज इंसान शायद इतनी तरक्की नहीं हासिल करता। ज़ाहिर है इंसान एक ऐसा राही है जिसने आरम्भ से ही शब्दों की यात्रा की है... उसका ये सफ़र न अब तक रूका है और न ही कभी आगे रुकेगा। हम, आप, सभी इस सफ़र में हैं और इसका हम एहसास तक नहीं कर पाते। इस पोस्ट को मैं ज्यादा लंबा नहीं करूंगा। बस आप लेखकों से एक अपील है- इस ब्लॉग के लिए भी लिखें। शब्द के बटोही आपके लिखे लेखों को सब लोगों तक पहुंचाने की कोशिश है। इतना ही नहीं, लोग आपके ब्लॉग को पढेंगे और अपनी प्रतिक्रिया भी देंगे। ये प्रतिक्रियाएं भी आपके और पढने वालों के लिए ख़ासा महत्वपूर्ण साबित होगा। सो देर किस बात की। आप भी शुरू हो जाइए शब्द के इस बटोही के साथ। यकीन मानिए बहुत अच्छा लगेगा - आपको भी और पढ़नेवालों को भी।