आज जबकि मिट गयी हैं दूरियां
रह नहीं पाया है कोई फासला
शब्द जो कि बोझ थे ताजिंदगी
अब ये जाना शब्द ही थे घोंसला...
रह नहीं पाया है कोई फासला
शब्द जो कि बोझ थे ताजिंदगी
अब ये जाना शब्द ही थे घोंसला...
दोस्तों, शब्दों की इस दुनिया में ये मेरी पहली पोस्ट है। ज़रा सोचिये, अगर शब्द नहीं होते तो दुनिया कैसी होती। न जाने कितनी बेरंग होती। सिर्फ चेहरे पर ही कुछ भावों को दिखाकर हम कितना कुछ कर पाते। शब्दों की दुनिया न होती तो आज इंसान शायद इतनी तरक्की नहीं हासिल करता। ज़ाहिर है इंसान एक ऐसा राही है जिसने आरम्भ से ही शब्दों की यात्रा की है... उसका ये सफ़र न अब तक रूका है और न ही कभी आगे रुकेगा। हम, आप, सभी इस सफ़र में हैं और इसका हम एहसास तक नहीं कर पाते। इस पोस्ट को मैं ज्यादा लंबा नहीं करूंगा। बस आप लेखकों से एक अपील है- इस ब्लॉग के लिए भी लिखें। शब्द के बटोही आपके लिखे लेखों को सब लोगों तक पहुंचाने की कोशिश है। इतना ही नहीं, लोग आपके ब्लॉग को पढेंगे और अपनी प्रतिक्रिया भी देंगे। ये प्रतिक्रियाएं भी आपके और पढने वालों के लिए ख़ासा महत्वपूर्ण साबित होगा। सो देर किस बात की। आप भी शुरू हो जाइए शब्द के इस बटोही के साथ। यकीन मानिए बहुत अच्छा लगेगा - आपको भी और पढ़नेवालों को भी।
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