मेरी थाती।
1. ये उनके दिए ज़ख्म हैं.. जाएंगे भी भला कैसे...
उन्हें कुरेदने में मज़ा आता है.. मुझे सहेजने में... दिलीप कुमार पांडेय।
2. ज़िंदगी की कशमकश में..
क्या हुआ जो कुछ खो गया...
मेहरबानी अभी है उसकी मुझपर..
जो दिया वो भी अनमोल है... दिलीप कुमार पांडेय।
3. हर ज़ख्म पर वो मुस्कुराते हैं ऐसे...
जिस्म पर एक नया 'तमगा' हो जैसे...
और क्या करूं उस 'ख़लील' का बयां...
इंसान के रूप में 'मसीह' हो जैसे... दिलीप कुमार पांडेय।
4. सीने में हजार ज़ख्म हैं...
पर लबों पर मुस्कान है...
खुद सूखी रोटी खाते है...
औरों के लिए धनवान हैं...
यही तो जीने की कला है...
बाकी तो मौत के सामान है... दिलीप कुमार पांडेय।
5. हर रोज तेरी निगाहों से क़त्ल होते हैं...
अब तो मरने की आदत सी हो गयी है... दिलीप कुमार पांडेय।
6. टूटकर उसके बिखरने की अदा तो देखिये...
हर टुकड़े को सहेजने की कला तो देखिये...
कौन कहेगा वो कतरा-कतरा बिखरा है...
हर कतरे के साथ उसकी वफ़ा तो देखिये... दिलीप कुमार पांडेय।
7. जीने - मरने का अहसास है.. तेरा होना, ना होना...
कैसी विडंबना है.. ज़ख्म तू है तो मरहम भी तुम ही हो... दिलीप कुमार पांडेय।
8. खिला हुआ 'चांद' कितना सकून देता है...
पर अफसोस कि हर दिन ये रूप बदल लेता है... दिलीप कुमार पांडेय।
9. पेड़ से टूटे शाख कब बेकार होते हैं...
आसमान से गिरी बूंदें कब जाया होती हैं...
वक्त की पहरेदरी में भी कबतक बंधा है कोई...
ये धरती, फिज़ां, ये आसमां, अपने ही तो हैं...
फिर किसी से ज़ुदा होने पर दर्द क्यों...
ज़िंदगी में कुछ खोने या नहीं होने पर अफसोस क्यों...
ये माना कि आज घना अंधियारा है...
लेकिन ये भी हकीकत है, कल फिर एक नया सवेरा है... दिलीप कुमार पांडेय।
10. तुम अपने जाने की वजह जो बता देते...
यकीं मानो, मंज़िल तक छोड़ने हम भी आते...
अब तो ना तू है, ना ही तेरा पता...
क्या होता, जो जाते-जाते अलविदा कह जाते... दिलीप कुमार पांडेय।
1. ये उनके दिए ज़ख्म हैं.. जाएंगे भी भला कैसे...
उन्हें कुरेदने में मज़ा आता है.. मुझे सहेजने में... दिलीप कुमार पांडेय।
2. ज़िंदगी की कशमकश में..
क्या हुआ जो कुछ खो गया...
मेहरबानी अभी है उसकी मुझपर..
जो दिया वो भी अनमोल है... दिलीप कुमार पांडेय।
3. हर ज़ख्म पर वो मुस्कुराते हैं ऐसे...
जिस्म पर एक नया 'तमगा' हो जैसे...
और क्या करूं उस 'ख़लील' का बयां...
इंसान के रूप में 'मसीह' हो जैसे... दिलीप कुमार पांडेय।
4. सीने में हजार ज़ख्म हैं...
पर लबों पर मुस्कान है...
खुद सूखी रोटी खाते है...
औरों के लिए धनवान हैं...
यही तो जीने की कला है...
बाकी तो मौत के सामान है... दिलीप कुमार पांडेय।
5. हर रोज तेरी निगाहों से क़त्ल होते हैं...
अब तो मरने की आदत सी हो गयी है... दिलीप कुमार पांडेय।
6. टूटकर उसके बिखरने की अदा तो देखिये...
हर टुकड़े को सहेजने की कला तो देखिये...
कौन कहेगा वो कतरा-कतरा बिखरा है...
हर कतरे के साथ उसकी वफ़ा तो देखिये... दिलीप कुमार पांडेय।
7. जीने - मरने का अहसास है.. तेरा होना, ना होना...
कैसी विडंबना है.. ज़ख्म तू है तो मरहम भी तुम ही हो... दिलीप कुमार पांडेय।
8. खिला हुआ 'चांद' कितना सकून देता है...
पर अफसोस कि हर दिन ये रूप बदल लेता है... दिलीप कुमार पांडेय।
9. पेड़ से टूटे शाख कब बेकार होते हैं...
आसमान से गिरी बूंदें कब जाया होती हैं...
वक्त की पहरेदरी में भी कबतक बंधा है कोई...
ये धरती, फिज़ां, ये आसमां, अपने ही तो हैं...
फिर किसी से ज़ुदा होने पर दर्द क्यों...
ज़िंदगी में कुछ खोने या नहीं होने पर अफसोस क्यों...
ये माना कि आज घना अंधियारा है...
लेकिन ये भी हकीकत है, कल फिर एक नया सवेरा है... दिलीप कुमार पांडेय।
10. तुम अपने जाने की वजह जो बता देते...
यकीं मानो, मंज़िल तक छोड़ने हम भी आते...
अब तो ना तू है, ना ही तेरा पता...
क्या होता, जो जाते-जाते अलविदा कह जाते... दिलीप कुमार पांडेय।
बहुत खूब दिलीप जी ...आप कवि भी हैं यह तो मुझे पता ही नहीं था .....सचमुच आपने अच्छा लिखा है . सिलसिला जारी रहे ....बधाई
ReplyDeleteप्रवीण बागी
पटना
Aapke anmol shabdon ka aabhari hoon bhaiya... silsila jaari rahega....
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