Sunday, November 10, 2013

मेरी थाती ... 2


मेरी थाती।।।



71. इक आह जो दिल से निकली.. महफिल वाह-वाह से गूंज उठी...
हमनें तो ग़म का राग छेड़ा था.. लोगों ने सर आँखों बैठा लिया...    दिलीप कुमार पांडेय।


72. मेरे पास तो आज कोई ग़म नहीं है...
लेकिन ये क्या कम है कि, यार मेरा उदास है...   दिलीप कुमार पांडेय।


73. खंज़र जब पीछे लगा, तो एहसास हुआ...
शायद किसी दोस्त नें नज़र फेर ली है....
हमने तो उनकी ख़ातिर ही सर झुकाया था...
क्या मालूम.. उन्हें मौके की तलाश है....    दिलीप कुमार पांडेय।


74. कैसे बाज़ारू हो गये हैं हम...
अदना सा ख़रीदार भी.. क़ीमत लगा जाता है...
बहुत कोशिश की... क़ायम रहे वजूद...
पर क्या हो.. जब साथी भी कतार में नज़र आता है...    दिलीप कुमार पांडेय।


75. 'मिट्टी के बुतों की अकड़ तो देखिये...
खुद अपनी 'मिट्टी को भूल गये है...
कोई जरा बताये इनको...
टूटने के बाद मिलना भी इसी 'मिट्टी में है...    दिलीप कुमार पांडेय।


76. सवाल पर सवाल का बोझ बढ़ता ही जा रहा है...
जवाब भी है.... पर इतना सीमित कि, दबता ही जा रहा है...    दिलीप कुमार पांडेय।


77. सुना था.. दिल मांगी हुई हर दुआ कबूल होती है...
कैसे नादां थे हम....
हमने तो आशनाई में कलेजा चीर कर पेश कर दिया...
उनसे चेहरे का नक़ाब भी ना हटाया गया...      दिलीप कुमार पांडेय।


78. तारीफ़ के चंद अल्फ़ाज़ों से ही...
खुदा समझने लगे वो खुद को...
उन्हें ये इल्म नहीं शायद...
बुतों में जान कहां होती है....   दिलीप कुमार पांडेय।


79. ग़ैरों में कहां दम, जो मेरी हस्ती मिटा सकें...
वो तो हमीं हैं, कि खुद अपनी कब्र खोदे बैठे है...    दिलीप कुमार पांडेय।


80. वो कौन है, आखिर वास्ता क्या है उनसे मेरा...
सुबह-शाम यही सवाल जेहन में कौंधता है...
एक चेहरा है, खुबसूरत है.. बस इतना पता है मुझे...
चाहता तो हूं, चेहरे के पीछे के चेहरे को पढ़ना...
लेकिन, डर है.. नकाब उसका उतरेगा, तो बेनकाब.. मैं भी कहां रहूंगा।    दिलीप कुमार पांडेय।

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