मेरी थाती …।
61. एक वादा था उनका, जो फिर टूट गया,
एक दिलासा था उनका, जो बिखर गया
मैंने उम्मीद तो नहीं की थी,
भरोसा उनका था, खुद ही तोड़ दिया... दिलीप कुमार पांडेय।
62. ज़िंदगी ठहरी सी ज़रूर है ,
लेकिन रुकना नहीं आता ।
है डगर कठिन मगर,
मुझे टूटना नहीं आता ।
हौसला हमसफ़र है मेरा,
पीछे मुड़कर देखना नहीं आता.... दिलीप कुमार पांडेय।
63. लोग मुझे नक़ाबपोश कहते हैं.,
यहां तो चेहरों के पीछे कई चेहरे नज़र आते हैं... दिलीप कुमार पांडेय।
64. एक सपना था..
जो कभी अपना था...
वक्त बदला.. साल बदले...
महिना बदला.. दिन बदले...
अपना, वो आज भी है...
लेकिन.. सपनों में... दिलीप कुमार पांडेय।
65. ये किसकी अट्टाहास है, लगता है फिर कोई उदास है...
कैसी विडंबना है ये..
हर चेहरे के पिछे, इक चेहरा नज़र आता है...
कही मुस्कुराता, तो कही स्याह नज़र आता है...
पूछते हैं अक्सर आईने से, दमकते चेहरे...
क्या बात है, जो तुझे नज़र नहीं आता है... दिलीप कुमार पांडेय।
66. झूठ के सामने सच कितना बेबस है...
तमाम खूबियां हैं.. फिर भी हम नतमस्तक है...
वक्त का फरेब है.. या कमजोरी मेरी...
आखिर कब तक सहेंगे झूठ की सीनाजोरी...
चाहता तो हूं.. वो सामने से हो मुक़ाबिल...
लेकिन वो झूठ है.. इस बात का इल्म उसे भी है... दिलीप कुमार पांडेय।
67. उसने कहा, भगवान हूँ...
मैने कहा, इंसान हूँ...
उसने कहा, रकीब हूँ...
मैने कहा, कनीज़ हूँ...
उसने कहा, नसीब हूँ...
मैने कहा, फकीर हूँ...
उसने कहा, खुद्दारी है...
मैने कहा, अहंकार है...
उसने कहा, मिट जाओगे...
मैने कहा, बिछ जाऊंगा...
उसने कहा, लाचारी है...
मैने कहा, बिमारी है...
उसने पूछा, तुम कौन हो...
मैने कहा, तुम्हारा दोस्त...! दिलीप कुमार पांडेय।
68. आज चांद को मुस्कुराते देखा...
लगा जैसे.. सूरज काली घटाओं से निकलने की जद्दोजहद में हो...?
आज चांद को मुस्कुराते देखा...
जैसे तेज आंधी में दिया टिमटिमा रहा हो...?
आज चांद को मुस्कुराते देखा...
लगा जैसे.. बंद कली से भौंरा रस निकाल रहा हो...?
काश ! चांद कभी यूं भी मुस्कुराये..
जैसे बादलों को चीरकर सूरज निकलता है... ।
काश ! चांद कभी ऐसे मुस्कुराये...
जैसे अंधेरे को दीपक रोशन करता है...।
काश ! चांद कभी ऐसे भी मुस्कुराये...
जैसे फूलों के पास भौंरा मंडराता है...। दिलीप कुमार पांडेय।
69. ज़िंदगी तेरी सूरत भी अजीब है...
चाहत थी मुरीद बनूं तेरा...
लेकिन वक्त ने कनीज़ बना दिया...
ज़िंदगी तेरी सीरत भी अजीब है..
सोंचा तो था दिल में बसूं तेरे...
लेकिन हालात ने दर-बदर कर दिया...
कैसी ये फितरत है ज़िदगी तेरी...
वो सबकुछ दिया.. जो मांगा न गया...
लेकिन क्या हिसाब उसका, जो तूने मांगने पर भी ना दिया... दिलीप कुमार पांडेय।
70. जब उनकी आशनाई नहीं थी.. मेरे पास तनहाई भी नहीं थी...
अब दिल उनका दिवाना है.. और मैं तनहाई का... दिलीप कुमार पांडेय।
61. एक वादा था उनका, जो फिर टूट गया,
एक दिलासा था उनका, जो बिखर गया
मैंने उम्मीद तो नहीं की थी,
भरोसा उनका था, खुद ही तोड़ दिया... दिलीप कुमार पांडेय।
62. ज़िंदगी ठहरी सी ज़रूर है ,
लेकिन रुकना नहीं आता ।
है डगर कठिन मगर,
मुझे टूटना नहीं आता ।
हौसला हमसफ़र है मेरा,
पीछे मुड़कर देखना नहीं आता.... दिलीप कुमार पांडेय।
63. लोग मुझे नक़ाबपोश कहते हैं.,
यहां तो चेहरों के पीछे कई चेहरे नज़र आते हैं... दिलीप कुमार पांडेय।
64. एक सपना था..
जो कभी अपना था...
वक्त बदला.. साल बदले...
महिना बदला.. दिन बदले...
अपना, वो आज भी है...
लेकिन.. सपनों में... दिलीप कुमार पांडेय।
65. ये किसकी अट्टाहास है, लगता है फिर कोई उदास है...
कैसी विडंबना है ये..
हर चेहरे के पिछे, इक चेहरा नज़र आता है...
कही मुस्कुराता, तो कही स्याह नज़र आता है...
पूछते हैं अक्सर आईने से, दमकते चेहरे...
क्या बात है, जो तुझे नज़र नहीं आता है... दिलीप कुमार पांडेय।
66. झूठ के सामने सच कितना बेबस है...
तमाम खूबियां हैं.. फिर भी हम नतमस्तक है...
वक्त का फरेब है.. या कमजोरी मेरी...
आखिर कब तक सहेंगे झूठ की सीनाजोरी...
चाहता तो हूं.. वो सामने से हो मुक़ाबिल...
लेकिन वो झूठ है.. इस बात का इल्म उसे भी है... दिलीप कुमार पांडेय।
67. उसने कहा, भगवान हूँ...
मैने कहा, इंसान हूँ...
उसने कहा, रकीब हूँ...
मैने कहा, कनीज़ हूँ...
उसने कहा, नसीब हूँ...
मैने कहा, फकीर हूँ...
उसने कहा, खुद्दारी है...
मैने कहा, अहंकार है...
उसने कहा, मिट जाओगे...
मैने कहा, बिछ जाऊंगा...
उसने कहा, लाचारी है...
मैने कहा, बिमारी है...
उसने पूछा, तुम कौन हो...
मैने कहा, तुम्हारा दोस्त...! दिलीप कुमार पांडेय।
68. आज चांद को मुस्कुराते देखा...
लगा जैसे.. सूरज काली घटाओं से निकलने की जद्दोजहद में हो...?
आज चांद को मुस्कुराते देखा...
जैसे तेज आंधी में दिया टिमटिमा रहा हो...?
आज चांद को मुस्कुराते देखा...
लगा जैसे.. बंद कली से भौंरा रस निकाल रहा हो...?
काश ! चांद कभी यूं भी मुस्कुराये..
जैसे बादलों को चीरकर सूरज निकलता है... ।
काश ! चांद कभी ऐसे मुस्कुराये...
जैसे अंधेरे को दीपक रोशन करता है...।
काश ! चांद कभी ऐसे भी मुस्कुराये...
जैसे फूलों के पास भौंरा मंडराता है...। दिलीप कुमार पांडेय।
69. ज़िंदगी तेरी सूरत भी अजीब है...
चाहत थी मुरीद बनूं तेरा...
लेकिन वक्त ने कनीज़ बना दिया...
ज़िंदगी तेरी सीरत भी अजीब है..
सोंचा तो था दिल में बसूं तेरे...
लेकिन हालात ने दर-बदर कर दिया...
कैसी ये फितरत है ज़िदगी तेरी...
वो सबकुछ दिया.. जो मांगा न गया...
लेकिन क्या हिसाब उसका, जो तूने मांगने पर भी ना दिया... दिलीप कुमार पांडेय।
70. जब उनकी आशनाई नहीं थी.. मेरे पास तनहाई भी नहीं थी...
अब दिल उनका दिवाना है.. और मैं तनहाई का... दिलीप कुमार पांडेय।
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