मेरी थाती।।।
81. इरादों ने बनाया बनाया था
हाथों से सजाया था
इस अजनबी शहर में
एक आशियाना बनाया था...
बहुत मिला, बहुत किया
वक्त यूं ही उड़ता रहा
खुशियां मिलीं, ज़िंदगी संवरी
अनजाने भी... जान बने...
अचानक तारीख़ बदली है
सब बिखरा-बिखरा सा है
नया आशियाना सजाने
अब रुख़सत की बेला है... अलविदा हैदराबाद। दिलीप कुमार पांडेय।
82. ज़िंदगी हर रोज एक नयी कहानी है...
सहेजो, तो किताब बन जाये....
नहीं, तो जमाने की आंधी के आगे,
पन्ने की क्या बिसात.... दिलीप कुमार पांडेय।
83. यूं तो राह-ए-ज़िंदगी आसां नही होती...
चलते सब हैं, मगर मंज़िल नहीं मिलती...
अज़ब फलसफ़ा है ये ज़िंदगी का...
किसी को पूरी, तो किसी को आधी भी नहीं मिलती... दिलीप कुमार पांडेय।
84. हर दिन ख़ास होता है... हर बात ख़ास होती है...
ज़िंदगी तेरी सुबह और शाम ख़ास होती है...
जाने मैं किस उधेड़बुन में हूं...
रास्ता भी है, मंज़िल भी...
फिर क्या बात है... जो निराश करती है... दिलीप कुमार पांडेय।
85. सामने समंदर, और अंदर प्यास भी है...
हर गुज़रता लम्हा, कुछ उदास... और कुछ ख़ास भी है...
किसे पसंद नहीं... आसमां की बलंदियां हासिल करना...
इक हम हैं... कि जमीं छोड़... कदम उठते ही नहीं... दिलीप कुमार पांडेय।
86. अंदर इक कश्मकश सी है...
वक्त ने दोराहे पर ला पटका है...
ऐ ख़ुदा इक नज़र इधर भी कर...
बिखरने से पहले, समेट लूं आशियाने को... दिलीप कुमार पांडेय। (09/-1/2013).
81. इरादों ने बनाया बनाया था
हाथों से सजाया था
इस अजनबी शहर में
एक आशियाना बनाया था...
बहुत मिला, बहुत किया
वक्त यूं ही उड़ता रहा
खुशियां मिलीं, ज़िंदगी संवरी
अनजाने भी... जान बने...
अचानक तारीख़ बदली है
सब बिखरा-बिखरा सा है
नया आशियाना सजाने
अब रुख़सत की बेला है... अलविदा हैदराबाद। दिलीप कुमार पांडेय।
82. ज़िंदगी हर रोज एक नयी कहानी है...
सहेजो, तो किताब बन जाये....
नहीं, तो जमाने की आंधी के आगे,
पन्ने की क्या बिसात.... दिलीप कुमार पांडेय।
83. यूं तो राह-ए-ज़िंदगी आसां नही होती...
चलते सब हैं, मगर मंज़िल नहीं मिलती...
अज़ब फलसफ़ा है ये ज़िंदगी का...
किसी को पूरी, तो किसी को आधी भी नहीं मिलती... दिलीप कुमार पांडेय।
84. हर दिन ख़ास होता है... हर बात ख़ास होती है...
ज़िंदगी तेरी सुबह और शाम ख़ास होती है...
जाने मैं किस उधेड़बुन में हूं...
रास्ता भी है, मंज़िल भी...
फिर क्या बात है... जो निराश करती है... दिलीप कुमार पांडेय।
85. सामने समंदर, और अंदर प्यास भी है...
हर गुज़रता लम्हा, कुछ उदास... और कुछ ख़ास भी है...
किसे पसंद नहीं... आसमां की बलंदियां हासिल करना...
इक हम हैं... कि जमीं छोड़... कदम उठते ही नहीं... दिलीप कुमार पांडेय।
86. अंदर इक कश्मकश सी है...
वक्त ने दोराहे पर ला पटका है...
ऐ ख़ुदा इक नज़र इधर भी कर...
बिखरने से पहले, समेट लूं आशियाने को... दिलीप कुमार पांडेय। (09/-1/2013).
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